स्वराज
स्वराज
जाग उठी अब सोई जनता,
बदला रुख जन सैलाब का,
राजनीति की गलियारों में,
पुनर्जन्म हुआ स्वराज का।
सूरज उदय हुआ फिर से,
लेकर एक नयी अँगड़ाई ,
भ्रष्ट खोखली सरकारों की,
कुर्सी फिर से थर्राई।
राजनीति के मुद्दे फिर से ,
बने सुसाशन और महँगाई ,
बेईमानों के खोखले वादों ने,
पहली बार है मुँह की खायी,
मन्दिर के मद्धम से मुद्दे,
मुफ्त की दी गई सौगातें,
नहीं खरीदेगी अब जनता,
सस्ते चावल सस्ते आटे।
यूँ ही नहीं हुआ परिवर्तन,
यूँ ही नहीं घटा आकर्षण,
वर्षोँ से कुचली गईं आवाज़ें ,
वर्षोँ से हुआ है शोषण,
कहीं है खाने के लाले,
कहीं परोसे जाते प्याले,
किसी के पास नहीं घर बार,
कोई रखे घरों के अंबार।
बहुत हो चुका भेदभाव,
खत्म हुआ झूठा सद्भाव ,
जाग खड़ी हुई अब जनता,
बिगुल बजा, सिंहनाद हुआ,
राज करेगी जागी जनता,
हर मन में विश्वास हुआ।


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