किसान की (आत्म)हत्या

                                                   
विगत दिनों एक किसान ने दिल्ली में सरकारी महकमे और तमाम आला अधिकारियों के सामने पेड़ से लटककर आत्महया कर ली। प्रथम द्रष्टया यह आत्महत्या का मामला लगता है, लेकिन यह आत्महत्या नहीं, हत्या है। जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री - सरकारी मशीनरी, नीति - नियम,  योजनाएँ - योजनाओं का कार्यान्वयन तक सभी ज़िम्मेदार हैं। जी हाँ, इन सब ने मिलकर इस किसान की हत्या की है और ना सिर्फ इस किसान की बल्कि इस जैसे हज़ारों किसानों की हत्या की है। 

यह कोई पहली मर्तबा नहीं है जब किसान ने मज़बूरी से समझौता ना करते हुए मौत से समझौता करना बेहतर समझा। किसानों के मरने की घटनाएँ देश के हर कोने से आ रही हैं, महाराष्ट्र का विदर्भ हो या  राजस्थान का दौसा हो या उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड। कारण क्या है, किसानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है ? कारण क्या है, सरकारें उद्योगों और  उद्योगपतियों के लिए तो अनुकूल वातावरण बनाने की कोशिश करती हैं और किसानों के लिए सिर्फ सब्सिडी और ऋण माफ़ी का सहारा लेती हैं ? कारण क्या है, सरकार किसानों की मूलभूत आवश्यकताओं के विकास के लिए योजनाएँ नहीं बनाती हैं और योजनाएँ बनती हैं तो गाँवों की बुनियादी सुविधाओं के निर्माण में दम तोड़ देती हैं? कारण क्या है, किसान, भारत की जनसंख्या के ५० प्रतिशत हैं और जी डी पी में सिर्फ १३- १४ प्रतिशत की हिस्सेदारी ही दे पाते हैं? कारण क्या है, किसान की निगाहें आज भी फसल की उपज के लिए आसमान की ओर रहती हैं? ऐसे कुछ सवाल हैं, जिनके जवाब ढूंढे नहीं गये हैं बल्कि सिर्फ सवाल बनाकर राजनीतिक रोटियाँ सेकीं गयीं हैं। 

मैं कृषि मंत्री या वित्त मंत्री तो नहीं जो कृषि उपज और कृषकों के विकास को आंकड़ों में पेश करुँ। वो आंकड़े जो कलेक्ट्रिएट की मेजों पर बनकर, कृषि  भवन के वातानुकूलित कमरों में संकलित होते हैं, इनका किसानों की वास्तविक स्थिति से कोई सरोकार नहीं होता। मैं तो आंकड़ों के पीछे की सच्चाई पर गौर करना पसंद करूँगा जो गाँव की पगडण्डी से गुजरकर, टूटे फूटे मिट्टी के मकानों में रहते हैं, शौच के लिए ३० लाख के आलिशान शौचालय में ना जाकर खुले खेतों का रुख करते हैं और इलाज़ के लिए गाँव के ही आला हकीम का। ये वो सच्चाई हैं जो वातानुकूलित कमरों से दिखाई  नहीं देती हैं और न ही जिसे कंप्यूटर  के किसी डाटा में उतारा जा सकता है, इसके लिए तो गाँव की धूल खानी होगी और धूप से निकला नमकीन पसीना चखना होगा।  

अानन फानन में योजना आयोग तो बदलकर नीति आयोग बन गया पर किसानों का उत्थान तो आनन फानन में नहीं हो सकता। उसके लिए तो आयोग गठित होंगे, जिनसे वास्तविक अवस्था की रिपोर्ट मांगी जाएगी  और तब उन रिपोर्ट्स के आधार पर योजनाएँ बनेंगी, फिर योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए एक मशीनरी बनायी  जायेगी। तब कहीं बदलाव का कार्यक्रम शुरू होगा।  भले ही केंद्रीय मंत्री अपनी जिम्मेदारियों से कितना भी पल्ला झाड़ें, पर किसान अभी भी अपनी स्थितियों के बदलाव के लिए भगवान और सरकार पर ही निर्भर है। 

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