नित नये विहान का शोर क्यों न करुँ मैं?
नित नये विहान का शोर क्यों
न करुँ मैं ?
नित नये विहान का शोर क्यों न करुँ मैं?
नभ के आभा पटल पर
अपने छा जाने की,
वक़्त के सरकते पहिये पर,
अपने प्रारूप की मिटती बनती,
तस्वीर की चोट क्यों न करूँ मैं?
कयों अपने प्रत्यक्ष का
प्रमाण न दूँ?
अपनी छवि को अँधेरे के गर्त में रख,
साया बनने की गति,
प्रकाश में भी
विलुप्तता की नियती
क्यों सहूँ मैं?
सूर्य ही यह अधिकार क्यों पाले?
किरण रथ पर सवार,
ऊष्मा व प्रकाश से
सबको अपना अहसास कराता,
मंद मंद मुस्काता ।
क्यों न यह मुस्कान कुटिल लगे?
क्या यह सबल के
हावी होने का प्रमाण नहीं?
सागर की मर्जी क्यों?
ज्वार भाटे से,
निस्तेज करता जलचरों
को,
डुबोता जलयानों को,
प्रदर्शित करता अपनी
जलशक्ति ।
क्यों सबल करें शक्ति प्रदर्शन ?
परिवर्तन चक्र में,
अपने उत्थान का उल्लास,
अपने पराक्रम का अट्टहास क्यों ना करूँ मैं?
इस नये विहान का शोर क्यों ना करूँ मैं?


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