प्रजातंत्र
प्रजातंत्र
प्रजातंत्र एक बार फिर,
सकुचाई, शरमाई है,
रोज हुए अत्याचारों से,
हर पल ये घबराई है ।
चुनी हुई सरकार का मुखिया,
हर मसले पर खामोश है,
शांत पड़ी हुई जनता में भी,
पल पल बढता आक्रोश है ।
लोकतंत्र की परिभाषा भी,
संविधान में पड़ी हुई है,
पाँच साल की मालिक सत्ता,
घोटलों से सनी हुई है ।
बोफोर्स से शुरु हुआ, स्टाम्प पर हुआ जवाँ,
चारा खाकर पला बढ़ा, ताबूत में भी ना मरा।
कभी हम प्रजतंत्र के आदर्श थे,
आज हमारे पास आदर्श है,
पतियों को एजी कहने वाले देश में,
2 जी और सी डब्लू जी का अब
क्रेज है ।
नेताजी देख रहे पर पौर्न हैं,
फिर भी जनता मौन है ।
पॉकेट मे नोट और संसद में
कोलगेट है,
क्या करें नेताजी, बढ़ रहा जो पेट है ।
आजाद हिंद की आजाद जनता,
आजादी को तरस रही,
खुद की सरकारों की लाठियाँ,
खुद के लोगों पर बरस रहीं ।
कार्टून बनाने वाला भी,
अब तो सजा यहाँ पाता है,
और गोलियाँ बरसाने वाला,
मुफ्त की रोटियाँ खाता है ।
लूट मची हो कोल ब्लॉक में,
पर ट्विटर ब्लॉक हो जाता है ।
अपने ही देश में लोगों को,
यू पी, बिहार और आसाम भगाया जाता है ।
कुछ सवाल यूँ गूँजते मन में,
कुछ सवाल अधमरे से तन में,
क्यों पड़े हैं हम चुप यहाँ,
क्यों खड़ें न हो चल पड़ें,
क्यों न करें हम कुछ बवाल,
क्यों अनशन में सिर्फ अन्ना, केजरीवाल ।


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