सोच

सोच

मार्क ज़ुकरबर्ग, स्टीव जॉब्स, थॉमस अल्वा एडिसन, मदर टेरेसा, महात्मा गाँधी, इन सब में एक समानता है जो उन्हें दूसरों से अलग करती है और ये समानता है "सोच", सकारात्मक सोच । सोच प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आगे बढ़ते रहने की, सोच अपने विचारों को फलीभूत न होते देख भी न झुकने की, सोच असफलता में भी सफलता की कूंजी ढूंढने की, सोच हर कदम पर नए विश्वास के साथ कुछ नया करने की । सोच ही हमारे जीवन के रूप रेखा की नींव तैयार करती है। हम जितनी सकारात्मक सोच रखेंगे, सफलता का मार्ग उतना ही प्रशस्त होगा ।
गाँधी जी के शब्दों में -
"अपने विचार सकारात्मक रखिये क्योंकि वो आपके शब्द बनेंगे । अपने शब्द सकारात्मक रखिये क्योंकि वो आपका व्यवहार बनेगा । व्यवहार सकारात्मक रखिये क्योंकि वो आपकी आदतें बनेंगीं । अपनी आदतें सकारात्मक रखियें क्योकि वो आपके सिद्धांत बनेंगे । अपने सिद्धांत सकारात्मक रखिये क्योंकि वो आपका भाग्य बनेगा। " महात्मा गाँधी के ये वाक़य सकारात्मक सोच के महत्व हो दर्शाते हैं।

हमारी सोच हमारे आसपास होने वाले घटनाक्रम पर प्रभाव डालती है और यह भी सच है कि हमारी सोच हमारे आसपास होने वाले घटनाक्रम की ही प्रतिबिम्ब है ।अब  हम दोनों पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं -
यह कहना कि हमारी सोच हमारे आसपास होने वाले घंटनाक्रम पर प्रभाव डालती है या हमारे कार्यों के परिणाम पर असर डालती है, इस सन्दर्भ में इतिहास में बहुत सारे उदाहरण मिल जायेंगे ।
रंगभेद नीति  के घोर विरोधी नेल्सन मंडेला का नाम किसने नहीं सुना होगा । सत्ताइस वर्षों तक जेल की कालकोठरी में रहने के बावजूद उन्होंने अपनी सोच को हमेशा सकारात्मक रखा, किसी दबाव को उन्होंने अपनी सोच पर हावी न होने दिया और परिणाम यह रहा कि १९९४ में दक्षिण अफ्रीका स्वतंत्र हुआ और रंगभेद की नीति समाप्त हुई । गौर करने वाली बात यह है अपने जीवन के कठिनतम वर्षों में नेल्सन मंडेला ने दो वाक्यों को अपनी शक्ति बनायीं रखी " मैं अपने भाग्य का स्वामी हूँ , मैं अपने आत्मा का सेनापति हूँ " । श्री मंडेला ने ये दो वाक्य जेल की दीवारों पर लिख रखे थे और अपने साथी कैदियों के साथ इसे दुहराते रहते थे ।
ये वाक्य आत्म प्रभुत्व की  प्रेरणा देते हैं और सकारात्मक सोच की शक्ति देते हैं । इस प्रक्रिया को कोई भी आजमा सकता है, हमारे जीवन में बहुत से ऐसे क्षण आते हैं, किसी क्षेत्र में असफल हो जाते हैं या जब हम खुद को बहुत ही कमज़ोर समझने लगते हैं। उस क्षण अगर हम ऊपर लिखी दो पंक्तियों को दुहरायें तो हमें अहसास होगा कि हमारा भय कम हो रहा है या खत्म हो रहा है और एक नयी ऊर्जा का संचार हो रहा  है और फिर हम दोगुने जोश से भर जाते हैं । यह असर उन दो जादुई पंक्तियों का नहीं है अपितु असर हमारी सोच में हुए  परिवर्तन का है । जब हम इन वाक्यों को दुहराते हैं तो हम अपने आसपास एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण करते हैं , अपनी सोच को एक उचित दिशा देते  हैं और परिणाम स्वरूप हम अपनी कमजोरियों पर काबू पाते हैं और सफलता की ओर अग्रसर होते हैं । यहाँ हमने देखा हमारी जीत, हार, ख़ुशी, दुःख सब एक तरह से हमारी सोच पर निर्भर करते हैं । हमारी सोच हमें एक स्थिति में रखती है, जैसे ही हमने सोच बदली परिस्थितियाँ बदल जाती हैं ।

दूसरे पहलू पर अगर हम नज़र डालें तो पायेंगे कि हमारे आसपास होने वाली परिस्थितयाँ भी हमारी सोच पर असर डालती हैं । इस पहलू को आप ऐसे समझ सकते हैं कि कोई कंपनी अगर एक बार सफल हो जाती है तो वो सफलता की ओर बढ़ती चली जाती है और कोई कंपनी अगर असफल होने लगती है तो यह क्रम भी चलता रहता है। अगर इसके कारण का विश्लेषण करें तो पाएंगे जो कंपनी सफल हो रही थी, उसके कर्मचारियों में सकारात्मक विचार थे जो उसे बुलंदियों की तरफ ले जा रहे थे , वहीं दूसरी तरफ असफल होने वाली कंपनी के कर्मचारियों में नकारात्मक विचार घर कर गए थे, जो विफलता का कारण बने। ऐसा नहीं है कि ये परिस्थिति स्थायी है, पर यह झकझोरने के लिए काफी है । कई लोग भयंकर झंझावातों से भी अपनी नाव को बाहर निकाल आते हैं और वो बाज़ीगर बन जाते हैं।

कुछ लोग प्रश्न करेंगे कि हम अपनी सोच को कैसे बदलें, इसी सोच के बल पर हमने अपने जीवन के इतने वर्ष गुजार दिए । कुछ ढीठ लोग तो यह भी कह सकते हैं कि मैं क्यों बदलूँ , मेरी सोच में कोई खराबी नहीं है या फिर अगर मैं सोच बदलता हूँ और कुछ और ही बुरा हो गया तो ? इस सारे सवालों का जवाब मैं न्यूटन के जड़ता के नियम से देना चाहूंगा । न्यूटन के जड़ता के नियम के अनुसार अगर कोई वस्तु स्थिर है तो स्थिर ही रहेगी और अगर गति में है तो गति में रहेगी जब तक कि उस पर  किसी बाह्य बल का प्रयोग ना किया जाये । यह नियम  हमारे मनो मस्तिस्क पर भी उसी प्रकार लागु होता है जिस प्रकार यह किसी वस्तु पर लागु होता है । सोच को बदलने की मूल समस्या यह है कि हम उसे बदलना ही नहीं चाहते , जैसे कि यह सार्वभौम सत्य है । हम अपनी सोच के इर्द गिर्द ही अपनी सामाजिक, मानसिक एवं भौतिक संघटनों का तानाबाना बुन लेते हैं और उससे मुक्त होना नहीं चाहते । हम काले बादल के अंदर छुपे इंद्रधनुष को देखना ही नहीं चाहते । फिर धीरे धीरे हम इन परिस्थितियों से ही अपना सरोकार कर लेते हैं , जबकि सत्य यह है कि अगर हम एक बार सोच बदलने की ओर कदम बढ़ाएं तो स्थितियों में आमूल चूल परिवर्तन आ सकता है । पर समस्या यह है कि बदलाव की शुरूआत कौन करे । पर अगर हम सोचे कि अगर धीरूभाई अम्बानी ने अपनी सोच नहीं बदली होती तो उनकी ज़िन्दगी यमन के किसी फर्म में गुजर जाती, पर उनकी बदली हुई सोच ने उन्हें सफलता के चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया । अफ्रिका में ट्रेन से फेंके जाने की घटना से गाँधी जी अगर विचलित हो गए होते और अपनी सोच को नकारात्मक बना लिया होता तो देश आज स्वतंत्र नहीं होता । पर गाँधी जी ने सोच बदली और उसे सकारात्मक दिशा में मोड़ा और इतिहास गवाह है कि साबरमती से संत के सामने अंग्रेजी सत्ता को झुकना पड़ा ।

अगर हम सोच के होने वाले परिणामों के कारणों पर जाएँ और वैज्ञानिक विश्लेषण करें तो बहुत ही अद्भुत से तथ्य सामने आते हैं । कई अनुसंधानों से पता चला है कि सकारात्मक सोच रखने वाले मरीज़ों की सुधार की गुंजाईश नकारात्मक सोच रखने वाले मरीज़ों से कई गुना ज्यादा होती है । तनाव, अवसाद, ह्रदय रोग जैसे रोगों से निदान में सकारात्मक सोच बड़ी भूमिका अदा करती है, यहाँ तक कि कैंसर, एड्स जैसे गम्भीर रोगों में भी सोच ने अप्रत्याशित परिणाम दिए हैं । सकारात्मक सोच मरीज़ों में एक उर्ज़ा का संचार करती रहती है, यह मस्तिष्क में एक ऐसी धारणा देती है जैसे कुछ नहीं हुआ है, या सब कुछ सही हो जायेगा, केवल धैर्य रखने कि आवश्यकता है । आप खुद अनुभव करेंगे कि जब आप किसी डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर के मुस्कान से आपकी आधी मर्ज़ गायब हो जाती है, इसके विपरीत अगर डॉक्टर ही शंकित है तो आपकी घबराहट बढ़ जाती है । कुछ डॉक्टर मरीज़ों को भुलावे में रखने के लिए कूटभेषज (प्लेसिबो ) दवा का प्रयोग करते हैं, मरीज़ इस भुलावे में रहता है कि उसके रोग का इलाज चल रहा है और वह बेहतर महसूस करता है । रोचक बात यह है कि यहाँ दवा रोग पर काम नहीं करती बल्कि सोच रोग पर काम कर रहा होता है । आपको जानकर हैरानी होगी कि कुछ मामलों में तो मरीज़ बिलकुल तंदरुस्त हो जाते हैं । यहाँ आप सकारात्मक सोच का प्रभाव देख सकते हैं ।

अपनी सोच को एक दिशा देना मुश्किल नहीं है और ना ही आसान है । सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम कितने अनुशासित हैं । अनुशासन हमारी शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं का । हम अपनी दिनचर्या में परिवर्तन लाकर अपनी सोच को बदल सकते हैं। अभ्यास न केवल हमारी शारीरिक ताकत को मज़बूत करते हैं बल्कि हमें मानसिक शक्ति भी देते हैं। एक स्फूर्तिवान व्यक्ति आलसी व्यक्ति से कहीं ज्यादा खुश रहता है । इसी प्रकार एक असफलता को अपनी सोच की धुरी बनाये रखना भी उपाय नहीं है, हम जितनी जल्दी अपनी असफलताओं से आगे निकल कर नयी दिशाओं कि तरफ रुख करे, उतना ही बेहतर होगा। वैसे भी प्रकृति ने बदलाव को ही सार्वभौम सत्य माना है । हमें हमेशा परिवर्तनशील रहना चाहिए । नयी विधाओं को सीखते और जानते रहने से भी हमारी सोच का विकास होता है । अपनी कल्पना में भी सकारात्मक सोच का साथ न छोड़ें तो सीप में छुपी मोती जैसी सफलता को पाना कोई मुश्किल काम नहीं है । 

Comments

Unknown said…
very niceee............:)
rohitkumar said…
Thanks Jitendra, Harsh and Chandrabhushan.

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