गणित
अरमान मचलते दिल के अन्दर, उड़ने के हर पल हर क्षण,
सुनता रुकता चंचल मन ,पर न रूकती दिल की धड़कन,
जंग छिड़ी खोने पाने की, खामोश पड़े हम तन्हा तन्हा,
बंद पड़े मन के आँगन में, उड़ने को है खुला आसमां।
लिखने की चाह तो बचपन से थी, और शायद जब से शब्दों को वाक्यों में ढलते देखा तब से ही मुझे कविता और कहानियों में रूचि लगने लगी। शायद मैं तीसरी चौथी कक्षा में रहा हूँगा जब मैंने अपनी पहली कविता लिखी थी। बचपन के खेलकूद में मुझे शब्दों से खेलना ज्यादा अच्छा लगने लगा। कुछ तोड़ मड़ोड़ किये शब्दों से बड़ों से शाबाशियाँ मिलने लगी तो हौसला और बढ़ने लगा। तब मेरी कवितायेँ मेरी डायरी के पन्नों में सिमित थीं।कभी कभार किसी महफिल में दोस्तों को सुना दिया करता था। कभी कभी शाबाशी मिल जाती थी, तो कभी मेरी कवितायेँ दुसरों को समझ नहीं आती थीं। मेरा सामाजिक परिवेश या यूँ कह लें पारिवारिक पृष्ठभूमि, ने मेरी कविताओं का रुख सामाजिक सरोकार वाली विषयों की तरफ़ मोड़ दिया।
फिर मैंने सोचा अपनी कविताओं को सबके सामने लाया जाये, कब तक पन्नों में कैद रहेंगी जिंदादिल कवितायेँ।एक माध्यम चाहिए था कविताओं को पन्नों से आज़ाद करने का, कुछ माध्यम मौजूद थे, जैसे पत्रिकाएं, अख़बार, या फिर इलेक्ट्रोनिक मीडिया। मैंने इलेक्ट्रोनिक मीडिया को चुना। मैंने कुछ कवितायेँ फेसबुक पर लिखीं और अपने अपने ब्लॉग के माध्यम से कवियों को सबके सामने लाने की कोशिश कर रहा हूँ। आज पहले पोस्ट में मैं अपनी बचपन की एक कविता लिखना चाहुँगा, जिसे मैंने शायद चौथी पाँचवी कक्षा में लिखा होगा। कविता का शीर्षक है "गणित".
हे अंको के महाराज , आप भीतर से हैं राज,
विषयों के सरताज आप से चलता पूरा काज,
ऐसा कीजिये काज , भारत करे मुझ पर नाज.
मैं एक अबोध बालक ,
तू बन जा मेरा पलक,
तुझे नमन कर पढने बैठूँ,
बदन कभी भी मैं न ऐठूँ .
एक बार सच्चा ज्ञान दिला दे,
परीक्षा में पोजिशन दिलवा दे,
तेरा सच्चा भक्त बन जाऊंगा,
तुझे पूज कर ही कुछ खाऊंगा.
गणित
हे अंको के महाराज , आप भीतर से हैं राज,
विषयों के सरताज आप से चलता पूरा काज,
ऐसा कीजिये काज , भारत करे मुझ पर नाज.
मैं एक अबोध बालक ,
तू बन जा मेरा पलक,
तुझे नमन कर पढने बैठूँ,
बदन कभी भी मैं न ऐठूँ .
एक बार सच्चा ज्ञान दिला दे,
परीक्षा में पोजिशन दिलवा दे,
तेरा सच्चा भक्त बन जाऊंगा,
तुझे पूज कर ही कुछ खाऊंगा.


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