हड़ताल
आज की मेरी कविता भी मेरी शुरू की कविताओं में से एक है। हड़ताल एक ज्वलंत समस्या है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था तो प्रभावित होती ही है, साथ साथ आम आदमी को भी काफ़ी तकलीफ झेलनी पड़ती है। इन्ही समस्याओं को ध्यान में रखते हुए मैंने कविता लिखी थी।
हड़ताल
पैसों की इस लूटमार में,
हड़तालों का तीव्र बयार है,
पैसों की चिंता रखते सब,
कामों की न चिंता प्यारी।
काम न हुए कोई बात न,
वेतन को अधिक बढ़ाना है,
लूटमार की असभ्य प्रणाली छोड़,
हड़तालों को अपनाना है।
आय दिन की हड़तालों से,
जनता पर क्या असर पड़ता है,
इसकी चिंता छोड़,
इन्हें सिर्फ हड़ताल ही करना है।
जनता की विशाल क्रांति से,
इस असभ्य प्रथा को मिटाना है,
शब्दकोष की शब्दावली से ,
'हड़ताल' शब्द को हटाना है।


Comments