ठण्ड
आज मैं बचपन की लिखी एक कविता पोस्ट करने जा रहा हूँ। जिसका शीर्षक है "ठण्ड". यह मेरी शुरू की कुछ कविताओं में से एक है। आज जब सोचता हूँ तो ये आभास होता है बालमन भी क्या सोचता रहता है, खुले मन सा हर तरफ उड़ना चाहता है, बचपन में जैसे पाँव एक जगह स्थिर नहीं रहते हैं उसी तरह सोच भी एक जगह स्थिर नहीं रहती है। पल भर में हम किसी से लड़ते हैं और अगले ही पल उस जैसा अभिन्न कोई नहीं रहता। बड़े जिस काम को मना करें, डांट सुनकर भी बालमन वही करना चाहता है।
बचपन की कवितायेँ भी ऐसे ही भाव लिए रहती हैं, सरल, सुगम और बिना किसी जटिलता को लिए। यह कविता भी उसी सरल मन की उपज है जिसमे कोई लाग लपेट नहीं है। बचपन में जो चीज़ मुझे सबसे ज्यादा डराती थी, उसपर मैंने ये कविता लिखी है।
बचपन की कवितायेँ भी ऐसे ही भाव लिए रहती हैं, सरल, सुगम और बिना किसी जटिलता को लिए। यह कविता भी उसी सरल मन की उपज है जिसमे कोई लाग लपेट नहीं है। बचपन में जो चीज़ मुझे सबसे ज्यादा डराती थी, उसपर मैंने ये कविता लिखी है।
ठण्ड
ठण्ड की अठखेलियाँ झेले न कोई,
इसे छोटा समझ इससे खेले न कोई,
नर्म बिस्तर, गर्म बिस्तर धकेले न कोई।
ठण्ड की यह ऐसी लीला,
हरों को भी कर दे पीला,
ठण्ड का जो पड़े प्रहार,
फसलों का कर दे चौपट व्यापार।
ऊनी कपडे, गर्म जूते ,
हीटर, कम्बल न अछूते,
ठण्ड कराये सब का व्यवहार,
इसलिए यह न है सदाबहार।
दिन निकला, शाम डूबी,
सूर्य भी न दिखता बखूबी,
दीन दुखी दुर्भाग्य को रोते,
रात चैन की नींद न सोते।
ठण्ड की विभीषिका को,झेले न कोई,
इसे छोटा समझ इससे खेले न कोई।
इसे छोटा समझ इससे खेले न कोई।


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